भारत-कनाडा के बीच बढ़ते टकराव के बीच विश्लेषकों को लगता है कि शीर्ष राजनयिकों के अभूतपूर्व निष्कासन से भारत और कनाडा के प्रधानमंत्रियों को अल्पावधि में राजनीतिक रूप से लाभ हो सकता है।
कनाडा ने सोमवार को छह भारतीय राजनयिकों को निष्कासित कर दिया था। कनाडा ने इस कदम को एक सिख अलगाववादी नेता की हत्या से जोड़ते हुए भारतीय असंतुष्टों को निशाना बनाने के व्यापक प्रयास का आरोप लगाया। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए छह कनाडाई राजनयिकों को वहां से चले जाने को कहा।
हालांकि जैसे को तैसा वाले कदम ने द्विपक्षीय संबंधों को और कड़वा कर दिया है। लेकिन नरेंद्र मोदी और जस्टिन ट्रूडो को इससे बहुत अधिक आपत्ति की संभावना नहीं है। दोनों नेता अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और अपने-अपने देश में राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
विश्लेषकों ने सुझाव दिया कि इस कदम से राष्ट्रीय सुरक्षा पर चिंता जताने वाले नेता के रूप में मोदी की छवि मजबूत हो सकती है। भारत के पूर्व विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने कहा कि मुझे लगता है कि लोग भारत सरकार को एक विकसित देश द्वारा दी गई धमकी और जबरदस्ती के कदमों के खिलाफ खड़े होते देखेंगे। जनता मजबूती से प्रधानमंत्री मोदी और सरकार का समर्थन करेगी।
गौरतलब है कि जून के चुनाव में मोदी को उस समय झटका लगा जब उनकी भारतीय जनता पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से अपना बहुमत खो दिया। अपनी कमजोर स्थिति में मोदी गठबंधन सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।
दूसरी ओर कनाडा अपने गृह राज्य पंजाब के बाहर सिखों की सबसे अधिक आबादी का ठिकाना है। वहां पर सिख कनाडा की आबादी का लगभग 2% हैं। एक अलग मातृभूमि बनाने के लिए हाल के वर्षों में हुए प्रदर्शनों ने भारत सरकार को परेशान कर दिया है। इसीलिए भारत सरकार लगातार कनाडा पर अलगाववादियों को पनाह देने का आरोप लगाती रही है।
नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक के विदेश नीति प्रमुख हर्ष पंत ने कहा कि ट्रूडो ने जितना अधिक भारत पर निशाना साधा, मोदी के लिए उतना ही बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि मोदी को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए खड़ा है। एक तरह से यह स्पष्ट करता है कि क्यों मोदी और उनकी लोकप्रियता पर आंच नहीं आएगी।
ट्रूडो की लिबरल पार्टी अक्टूबर 2025 तक होने वाले राष्ट्रीय चुनाव के लिहाज से बहुत पीछे चल रही है। मगर वर्तमान स्थिति ने नाखुश विधायकों द्वारा उनसे पद छोड़ने और एक नए नेता को पदभार संभालने का आग्रह करने के कथित प्रयास को सुर्खियों में ला दिया। रविवार को इस बारे में पूछे जाने पर ट्रूडो ने संवाददाताओं से कहा कि पार्टी की आंतरिक समस्याओं के बारे में किसी और समय बात की जाएगी।
फिलहाल इस सरकार और वास्तव में सभी सांसदों को कनाडा की संप्रभुता के लिए खड़े होने, हस्तक्षेप के खिलाफ खड़े होने और इस कठिन क्षण में कनाडाई लोगों का समर्थन करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
ट्रूडो को अपनी अल्पमत सरकार को जीवित रखने के लिए कनाडा के दोनों वामपंथी विपक्षी दलों के नेताओं का समर्थन चाहिए। इन हालात पर दोनों नेताओं ने कहा कि वे निष्कासन का समर्थन करते हैं।
वहीं, पीटरबरो में ट्रेंट यूनिवर्सिटी में राजनीति की प्रोफेसर क्रिस्टीन डी क्लेर्सी ने कहा कि ट्रूडो के लिए कोई भी झटका संभवतः संक्षिप्त होगा। उन्होंने कहा कि आप कह सकते हैं कि अल्पकालिक लाभ सुर्खियों को विस्थापित कर देगा।
विदेशी मोर्चे पर तनाव की तुलना में ट्रूडो के सामने घरेलू मोर्चों की चुनौतियों की फेहरिस्त न केवलव बहुत लंबी है बल्कि जटिल भी है। राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सिख समुदाय ने हाल के वर्षों में उदारवादियों और अन्य पार्टियों का समर्थन किया है। एक नेता ने कहा कि वह निष्कासन का स्वागत करते हैं लेकिन उन्हें उम्मीद नहीं है कि भारत के साथ विवाद का असर घरेलू राजनीति पर पड़ेगा।
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