चुनाव का मौसम तो चल ही रहा है, अब दिन भी दूर नहीं है। सभी की निगाहें मुख्य रूप से व्हाइट हाउस की दौड़ पर टिकी हुई हैं मगर देश भर में कई अन्य महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबलों पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव सामने है इसलिए उस पर ध्यान स्वाभाविक है। खासकर दोनों पक्षों के भारतीय-अमेरिकी कनेक्शन पर। हालांकि ये अन्य मुकाबले भारतीय अमेरिकी प्रवासियों के लिए विशेष रुचि के होने चाहिए। न केवल दांव पर लगे मुद्दों के कारण बल्कि इसमें शामिल भारतीय अमेरिकी उम्मीदवारों की भारी संख्या के लिहाज से भी। चाहे स्थानीय, राज्य या संघीय मुकाबले हों भारतीय मूल के उम्मीदवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें से कई खुले तौर पर और गर्व के साथ हिंदू धर्म का पालन करते हैं। इस वर्ष की शुरुआत में प्राइमरीज के दौरान यह भागीदारी और भी अधिक थी जब कई भारतीय अमेरिकियों ने ताल ठोकी। हालांकि कई असफल रहे।
चुनावी भागीदारी का यह स्तर केवल उन भौगोलिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है जहां भारतीय अमेरिकियों की संख्या अधिक है। पूरे देश में फैला हुआ है। अंततः, निर्वाचित होने वाले भारतीय अमेरिकियों की संख्या उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले उम्मीदवारों की संख्या। यह नागरिक भागीदारी पर बढ़त का प्रतीक है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय अमेरिकी आबादी बढ़ रही है और अधिक दृश्यमान हो रही है।
AAPI डेटा द्वारा प्रस्तुत एक नई संसाधन गाइड के अनुसार, जिसका शीर्षक है इंडियन अमेरिकंस : बाय द नंबर्स (भारतीय-अमेरिकी : संख्या के हिसाब से) तेजी से बढ़ते समुदाय के लिए AAPI डेटा गाइड अनुमानतः 48 लाख भारतीय अमेरिकी हैं (या जो इस तरह की पहचान रखते हैं)। इसी तरह इंडियास्पोरा की प्रभाव रिपोर्ट छोटा समुदाय, बड़ा योगदान, असीम क्षितिज, भारतीय अमेरिकियों की संख्या 51 लाख बताती है।
जैसे-जैसे प्रवासी भारतीयों की आबादी बढ़ेगी, यह स्वाभाविक है कि वे राजनीति में बड़ी भूमिका निभाएंगे और दान, वोट और उम्मीदवारों जैसे कई माध्यमों से चुनावों को प्रभावित करेंगे। वास्तव में, जैसा कि AAPI डेटा आगे बताता है, भारतीय अमेरिकियों में एशियाई अमेरिकियों के बीच पात्र मतदाताओं की मतदान दर सबसे अधिक 71% है और इस चुनाव में 91% की आश्चर्यजनक दर से मतदान करने की उम्मीद है। इसके अलावा इंडियास्पोरा के अनुसार, कांग्रेस के पांच मौजूदा भारतीय अमेरिकी सदस्यों और राज्य विधानसभाओं में सेवारत 40 भारतीय अमेरिकियों के अलावा, संघीय सरकार में उल्लेखनीय पदों पर लगभग 150 भारतीय अमेरिकी हैं। हालांकि वे अमेरिकी आबादी का केवल 1.5% प्रतिनिधित्व करते हैं।
लेकिन जो बदल गया है और उससे भी अधिक आशाजनक है प्रवासी भारतीयों की विकासवादी सोच और यह मान्यता कि स्थानीय और राज्य के पद, हालांकि उतने आकर्षक नहीं हैं, संघीय पदों की तुलना में, यदि अधिक नहीं, तो उतने ही प्रभावशाली हैं। हमेशा से यह मामला नहीं था। जब भारतीय अमेरिकियों ने पहली बार राजनीति में शामिल होना शुरू किया तो शुरू में उनका ध्यान मुख्य रूप से संघीय चुनावों पर केंद्रित था। चाहे वह उम्मीदवार हों, दानदाता हों या संघीय सरकार की भूमिकाओं में नियुक्त लोग हों।
परंपरागत रूप से स्थानीय और राज्य पद भारतीय अमेरिकियों की निगाहों में नहीं थे या उन्हें इनमें शामिल होना बहुत महत्वहीन लगता था। लेकिन चूंकि भारतीय अमेरिकियों ने उन मुद्दों को संबोधित करने में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो सीधे उनके दैनिक जीवन, स्थानीय और राज्य की राजनीति को प्रभावित करते हैं तो स्थानीय और राज्य पद भी सही मायने में तेजी से महत्वपूर्ण होते चले गये। इनमें स्कूल बोर्डों से लेकर नगर परिषद और काउंटी से लेकर राज्य विधायिका तक निर्वाचित पदों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।
रोजी-रोटी के मुद्दों के अलावा भारतीय अमेरिकी उम्मीदवार शिक्षा, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की भी परवाह करते हैं। भारतीय अमेरिकियों और विशेष रूप से हिंदू अमेरिकियों को नुकसान पहुंचाने वाली कई विधायी पहल और संकल्प स्थानीय और राज्य स्तर पर प्रस्तावित किए गए हैं। उदाहरण के लिए खालिस्तानी उग्रवाद को ढकने वाले अंतरराष्ट्रीय दमन बिल, भारतीय अमेरिकियों को निशाना बनाने वाली जाति नीतियां और भारत में जमीनी हकीकतों को गलत तरीके से पेश करने और हिंदुओं को निशाचर बताने वाले दर्जनों प्रस्ताव स्थानीय और राज्य स्तर पर प्रमुख रहे हैं।
यहां यह ध्यान देना होगा कि अतीत में कई उम्मीदवार अपनी जातीय और/या धार्मिक पहचान से दूर भागते थे (हालांकि हमेशा बॉबी जिंदल की तरह खुले तौर पर नहीं) किंतु आज वे खुले तौर पर दोनों को गले लगा रहे हैं। वास्तव में, कई बार आज के भारतीय अमेरिकी उम्मीदवार अपनी जातीय और धार्मिक पहचान और अपने (या अपने परिवार की) आप्रवासी सफलता की कहानी के सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित कर रहे हैं और साथ ही राजनीतिक परिदृश्य के मतदाताओं के व्यापक वर्ग से अपील कर रहे हैं। अब भले ही इन चुनावों का नतीजा कुछ भी हो एक बात निश्चित है और वह यह कि- एक राजनीतिक ताकत के रूप में भारतीय अमेरिकी यहां बने रहेंगे।
(लेखक हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक, नीति और कार्यक्रम, हैं)
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