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एच-1बी पर असमंजस, भारतीय आईटी कंपनियां बदल रहीं अमेरिकी रणनीति

बदलती नीतियों और सख्त वीज़ा नियमों के कारण अब कई कंपनियां लोकल हायरिंग, नियरशोर डिलीवरी सेंटर्स और रिमोट वर्क मॉडल को अपना रही हैं।

ट्रंप प्रशासन की वापसी से एच-1बी पॉलिसी और सख्त होने की संभावना बढ़ गई है। / Facebook @ Donald J. Trump

भारतीय कंपनियां लंबे समय से एच-1बी वीज़ा प्रोग्राम पर निर्भर रही हैं, खासकर टेक और आईटी सर्विस सेक्टर में। इस प्रोग्राम ने भारत के विशाल टैलेंट पूल और अमेरिका में कुशल प्रोफेशनल्स की बढ़ती मांग के बीच सेतु का काम किया है।

इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल जैसी आईटी दिग्गज कंपनियों ने इस वीज़ा का इस्तेमाल करके अपने टॉप टैलेंट को ऑनसाइट भेजा है। इससे प्रोजेक्ट डिलीवरी, क्लाइंट संतुष्टि और नॉलेज ट्रांसफर सुचारू हुआ है। क्लाइंट की लोकेशन पर ही एक्सपर्ट्स की मौजूदगी ने कम्युनिकेशन को बेहतर बनाया, समस्याओं को तेजी से हल किया और भरोसा मजबूत किया, जो आईटी कंसल्टिंग और सॉफ्टवेयर डेवेलपमेंट के लिए बेहद ज़रूरी है।

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इसके अलावा एच-1बी प्रोग्राम भारतीय प्रोफेशनल्स को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा एनालिटिक्स और साइबर सिक्योरिटी जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में योगदान करने का अवसर प्रदान करता है। यह क्रॉस बॉर्डर एक्सचेंज न सिर्फ भारतीय कंपनियों के लिए बल्कि अमेरिकी टेक इकोसिस्टम के लिए भी फायदेमंद रहा है।

हालांकि बदलती नीतियों और सख्त वीज़ा नियमों के कारण अब कई कंपनियां लोकल हायरिंग, नियरशोर डिलीवरी सेंटर्स और रिमोट वर्क मॉडल को अपना रही हैं। ये रणनीतिक बदलाव उनके लचीलेपन और नवीनता को दर्शाते हैं जिससे वे लगातार आर्थिक एवं तकनीकी विकास कर रही हैं।

एच-1बी नीतियों में बदलाव का असर 

भारतीय आईटी कंपनियां अब एच-1बी वीज़ा पर अपनी निर्भरता घटा रही हैं। अब वे अमेरिका में लोकल हायरिंग बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिए इन्फोसिस के अमेरिकी वर्कफोर्स में 60% से अधिक लोकल हायरिंग हो चुकी है जबकि टीसीएस में यह आंकड़ा 50% से ऊपर है। इससे वीज़ा से जुड़ी अनिश्चितताओं का जोखिम कम हो जाता है। इसके अलावा कंपनियां कनाडा और मैक्सिको में नियरशोर डिलीवरी सेंटर्स स्थापित कर रही हैं। भारत में ऑफशोर ऑपरेशंस को बढ़ावा दे रही हैं ताकि अमेरिका पर निर्भरता घटाई जा सके।

इन नीतिगत बदलावों का वित्तीय प्रभाव भी पड़ा है। प्रस्तावित नए नियमों से ज्यादा वेतन और अतिरिक्त शुल्क से भारतीय आईटी कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसकी वजह से अमेरिकी प्रोजेक्ट्स पर मार्जिन कम हो सकता है। इसे संतुलित करने के लिए कंपनियां हाई मार्जिन सर्विसेज पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, कर्मचारियों को एआई और क्लाउड कंप्यूटिंग में अपस्किल कर रही हैं और रिमोट वर्क मॉडल को बेहतर बना रही हैं।

ट्रंप प्रशासन की वापसी से एच-1बी पॉलिसी और सख्त होने की संभावना बढ़ गई है। अमेरिका में पढे़ आवेदकों और उच्च वेतन सीमा को प्राथमिकता दी जा सकती है। हालांकि भारतीय आईटी कंपनियां अब एच-1बी वीज़ा पर कम निर्भर हैं और नई रणनीतियों के साथ तैयार हैं। कई कंपनियां अमेरिका पर निर्भरता घटाने के लिए नए बाजारों में विस्तार कर रही हैं। स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों में निवेश कर रही हैं।

भारतीय STEM प्रोफेशनल्स पर प्रभाव

अमेरिका में वीज़ा प्रतिबंधों के कारण भारतीय STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) प्रोफेशनल्स को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वीज़ा आवेदन प्रक्रिया जटिल और लंबी हो गई है जिससे करियर प्लानिंग में अस्थिरता बढ़ रही है। इसके अलावा वैकल्पिक व्यावसायिक प्रशिक्षण (OPT) कार्यक्रम में संभावित प्रतिबंधों से स्नातक के बाद नौकरी के अवसरों में कमी आ सकती है।

कठिन वीज़ा नियमों के कारण कई भारतीय प्रोफेशनल्स अब कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे वैकल्पिक स्थानों पर जाने का विचार कर रहे हैं। इससे अमेरिका में टैलेंट की कमी हो सकती है और टेक्नोलॉजी सेक्टर की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।

भारतीय प्रोफेशनल्स का कनाडा, ऑस्ट्रेलिया की ओर रुझान

भारतीय टैलेंट अब अमेरिका की बजाय कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को प्राथमिकता दे रहा है। इसके मुख्य कारण हैं- आसान इमीग्रेशन पॉलिसी, नौकरी के बेहतर अवसर और उच्च जीवन स्तर। कनाडा की एक्सप्रेस एंट्री और प्रोविंशियल नोमिनी प्रोग्राम (PNP) जैसी योजनाएं स्थायी निवास (PR) पाने के लिए आसान मार्ग प्रदान करती हैं। इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया का जनरल स्किल्ड माइग्रेशन (GSM) प्रोग्राम और एम्प्लॉयर स्पॉन्सरशिप वीज़ा कुशल भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अवसर प्रदान करता है।

कनाडा में तीन साल तक पोस्ट-ग्रेजुएट वर्क परमिट मिलता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय छात्रों को मूल्यवान कार्य अनुभव प्राप्त करने का मौका मिलता है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय छात्रों के लिए MATES वीज़ा लॉन्च किया है, जिससे उन्हें दो साल तक काम करने का अवसर मिलेगा। गुणवत्ता जीवन और सांस्कृतिक अनुकूलन भी प्रवास के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कनाडा की बहुसांस्कृतिक समाज व्यवस्था और उच्च जीवन स्तर भारतीय प्रवासियों के अनुकूल है। इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया की समावेशी समाज व्यवस्था और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पेशेवरों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों में एच-1बी वीज़ा की भूमिका

एच-1बी वीज़ा अमेरिकी टेक इंडस्ट्री में स्किल गैप को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक सहयोग को भी मजबूत करता है, क्योंकि भारतीय प्रतिभा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गति देती है, जबकि भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों और तकनीकों तक पहुंच मिलती है। इसके अलावा भारतीय आईटी कंपनियों ने अमेरिका में भारी निवेश किया है। लगभग 1.1 बिलियन डॉलर अमेरिकी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और स्थानीय प्रतिभा को विकसित करने में लगाए गए हैं, जिससे 2.55 लाख से अधिक कर्मचारियों और 2.9 मिलियन छात्रों को लाभ हुआ है। 

हालांकि एच-1बी वीज़ा पर प्रतिबंधों के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। अमेरिकी टेक सेक्टर पहले से ही प्रतिभा की कमी का सामना कर रहा है, और 2033 तक इसमें 10 लाख से अधिक टेक कर्मचारियों की कमी होने की संभावना है। यदि कुशल विदेशी पेशेवरों की पहुंच सीमित कर दी जाती है, तो यह नवाचार को धीमा कर सकता है और आर्थिक वृद्धि बाधित हो सकती है। भारतीय टेक टैलेंट पर निर्भर अमेरिकी कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं। इससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी गिरावट आ सकती है और टेक्नोलॉजी एडवांसमेंट की गति धीमी हो सकती है।

भारतीय कंपनियों के लिए रणनीतिक विकल्प

एच-1बी वीज़ा पर निर्भरता से बचने के लिए भारतीय कंपनियां नियरशोर डिलीवरी सेंटर्स स्थापित कर रही हैं, खासकर मैक्सिको और कनाडा में। ये सेंटर बदलती वीज़ा नीतियों और बाजार की मांगों के अनुरूप खुद को ढालने में मदद करते हैं, जिससे कंपनियां अपनी दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रख सकें। मैक्सिको अमेरिका के करीब है यहां टाइम जोन लगभग समान हैं और सांस्कृतिक रूप से भी यह अनुकूल है जिससे सहयोग बेहतर होता है और डिलीवरी टाइम कम होता है। इसके अलावा, मैक्सिको यूएसएमसीए (यूएस, मेक्सिको और कनाडा के बीच व्यापार समझौता) का हिस्सा है, जो अमेरिका और कनाडा के साथ व्यापार को आसान बनाता है। दूसरी ओर, कनाडा अपनी लचीली इमीग्रेशन पॉलिसी और अमेरिका के करीब होने के कारण भारतीय कंपनियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन रहा है। इससे भारतीय कंपनियों को अमेरिका के वीज़ा प्रतिबंधों से बचने में मदद मिलती है।

लागत प्रभाव और प्रतिभा की उपलब्धता
नियरशोर डिलीवरी सेंटर्स से भारतीय कंपनियों को अमेरिका की तुलना में कम लागत में काम करने की सहूलियत मिलती है, साथ ही उपलब्ध कुशल प्रतिभा का लाभ उठाने में भी मदद मिलती है। मैक्सिको और कनाडा में बढ़ता आईटी और टेक्नोलॉजी टैलेंट पूल विशेष रूप से आईटी और टेक सेवाओं के लिए फायदेमंद है, जिससे कंपनियां उच्च-गुणवत्ता वाले समाधान प्रदान कर सकती हैं। टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो जैसी प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियां इन क्षेत्रों में अपने नियरशोर संचालन का विस्तार कर रही हैं ताकि वे एच-1बी वीज़ा पर निर्भरता कम कर सकें और क्लाइंट के करीब रहकर बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकें।

नियरशोर केंद्रों की स्थापना के माध्यम से भारतीय कंपनियां अपने संचालन का विस्तार कर रही हैं और अपने व्यवसाय को अधिक लचीला बना रही हैं। यह रणनीति उन्हें बदलते बाजार की स्थितियों और नियामकीय परिवेश के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम बनाती है, जिससे वे वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बनाए रख सकें।


(यह लेख करन एस. ठुकराल द्वारा लिखा गया है। इसमें उनके जूनियर एसोसिएट वकीलों की रिसर्च शामिल है। करन ठुकराल एनआरआई कानूनों में विशेष अनुभव रखते हैं खासकर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और रेगुलेशन्स के मामलों में। वे दिल्ली में स्थित "ठुकराल लॉ एसोसिएट्स" नाम की लॉ फर्म चलाते हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स के साथ काम करने का लंबा अनुभव है।)

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