ट्रम्प-मोदी वार्ता से पहले दोनों देशों के साधारण समाज, मीडिया और सियासी गलियारों में 'पता नहीं क्या होने वाला है' जैसा जो माहौल बना था उसका निष्कर्ष दोतरफा सार्थकता, लाभ और सबके लिए आशावाद के रूप में सामने आया है। हालांकि अभी यह सब कहना जल्दबाजी हो सकता है लेकिन उम्मीद के आधार पर तो माना ही जा सकता है कि दुनिया के दो महान लोकतंत्रों के प्रमुखों की वार्ता के बाद ढेर सारी आशंकाएं लगभग समाप्त हो गई हैं। कह सकते हैं कि मोदी-ट्रम्प दोस्ती कायम रहने वाली है और दोनों देशों के बीच परस्पर व्यापारिक लाभ की राहें भी लचीला रुख अपनाते हुए तलाश ली गई है। इन राहों को अल्पकालिक लाभ या हानि के तौर पर नहीं दीर्घकालिक सकारात्मक प्रतिफल और मजबूत संबंधों की प्राप्ति के लक्ष्य के साथ तैयार करने की प्रतिबद्धता भी दिखलाई गई है। लिहाजा, लग रहा है कि मोदी-ट्रम्प की मित्रता दोनों देशों के साथ-साथ दुनिया के भी काम आने वाली है।
द्विपक्षीय वार्ता की सबसे अहम बात यह रही कि अमेरिका ने वही किया जो उसने तय कर रखा था और भारत ने वक्त की नजाकत को भांपकर 'आशंकित टकराव' को अवसर और उम्मीदों में बदलते हुए स्वाभिमान के साथ अपनी प्राथमिकताएं अमेरिका और दुनिया के सामने रखीं। दुनिया में साथ-साथ कदमताल करने के लिए ट्रम्प ने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) का नारा तो पहले ही दिया था, भारत के प्रधानमंत्री ने इसी से 'प्रेरणा पाकर' मेक इंडिया ग्रेट अगेन (MIGA) की 'रचना' अमेरिका में ही राष्ट्रपति के साथ बैठकर की। ट्रम्प MAGA की राष्ट्रवादी कश्ती पर सवार होकर ही दूसरी बार सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं और मोदी 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात लंबे समय से कर रहे हैं। अमेरिका में मोदी ने इन दोनों जुमलों का वैश्विक विस्तार भी किया। बकौल मोदी अमेरिका और भारत मिलकर 2 नहीं 11 की शक्ति बनाते हैं और यह 11 की शक्ति विश्व कल्याण के लिए काम करेगी। बेशक, विश्व कल्याण के लिए सर्वप्रथम शांति आवश्यक है। रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भारत शांति की बात लंबे समय से कर रहा है। पीएम मोदी ने ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन को युद्ध छोड़कर शांति की राह पर लाने की पहल की। कालांतर में इस पहल में ट्रम्प भी शांमिल हो गये। चुनाव से पहले ही ट्रम्प ने इस जंग को खत्म कराने का ऐलान कर दिया था। ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद तो पुतिन यह तक कह चुके हैं कि अगर अमेरिका में सत्ता की बागडोर पहले ही ट्रम्प के हाथ होती तो युद्ध की नौबत ही न आती। भारत-अमेरिका की संयुक्त पहल से शांति बहाली की स्थितियां बन गई हैं। यह एक और एक 11 की सामूहिक शक्ति की नजीर मानी जा सकती है। युद्ध की स्थितियों में भारत ने हमेशा के लिए दुनिया के सामने अपना रुख भी साफ कर दिया है कि भारत तटस्थ नहीं, शांति का पक्षधर था, है और रहेगा। द्विपक्षीय मामलों में तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप भारत को कभी स्वीकार नहीं रहा और न रहेगा यह भी पुन: रेखांकित किया गया। चीन विवाद पर जब ट्रम्प ने मदद की बात कही तो भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में तीसरे पक्ष के लिए जगह नहीं है। इसी तरह बांग्लादेश का मुद्दा भी ट्रम्प ने भारत के प्रधानमंत्री के हाथ सौंपने की बात कहकर द्विपक्षीय स्थितियों की पुष्टि की है।
निसंदेह यह पारस्परिक समझ है जिसके आधार पर भारत-अमेरिका और ट्रम्प-मोदी आगे बढ़ रहे हैं। यदि संबंधों को मजबूती के साथ आगे तक ले जाना है, पारस्परिक हित और व्यापारिक लाभ का लक्ष्य हासिल करना है और दोनों समाज को और निकट लाना है तो इसी तरह एक-दूसरे का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होगा। मोदी-ट्रम्प वार्ता का फिलहाल को यही हासिल है।
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