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विभा बख्शी ने Sonrise पर कहा, बदलाव आ रहा है

भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशक विभा बख्शी ने अपनी पुरस्कृत डॉक्युमेंट्री सोनराइज (Sonrise) के जरिए भारत के पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिक भेदभाव और उसे चुनौती देने वाले नायकों पर न्यू इंडिया अब्रॉड से विशेष बातचीत की।

फिल्मकार विभा बख्शी को हाल ही में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। /

अवंतिका पांडा

प्रख्यात भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशक और रिस्पॉन्सिबल फिल्म्स की संस्थापक विभा बख्शी ने अमेरिका में आयोजित हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस के मौके पर एनआईए से विशेष बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपनी पुरस्कार विजेता डॉक्युमेंट्री सोनराइज (Sonrise) के पीछे के संदेश के बारे में चर्चा की, जो भारत के पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिक अधिकार नायकों की भूमिका पर प्रकाश डालती है।
 
बोस्टन वापस आकर कैसा लग रहा है?

मेरे पास बोस्टन की सबसे खास यादें हैं। मैंने बोस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। 2018 में बोस्टन यूनिवर्सिटी ने मुझे मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया था। यह बहुत बहुत स्पेशल है। मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन के सबसे अच्छे साल बोस्टन में बिताए हैं। 2018 मेरे लिए बहुत खास है, जब मैं मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिए बोस्टन आई थी। 

मेरी फिल्म बलात्कार और लैंगिक हिंसा जैसे ज्वलंत मुद्दे पर केंद्रित है। इसे हाल ही में भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म को भारत में डेढ़ लाख से अधिक पुलिस अधिकारियों के लिए प्रदर्शित किया गया था। जैसा कि हम जानते हैं कि जब तक विश्व में पुलिस कर्मचारियों और अधिकारियों को लैंगिक आधार पर संवेदनशील नहीं बनाया जाएगा, तब तक न्याय प्रदान करने में न सिर्फ देरी होगी बल्कि इससे वंचित होने की आशंका भी रहेगी। और इसीलिए यह इस आंदोलन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा था। मुझे यह साझा करते हुए गर्व महसूस हो रहा है कि फिल्म को दुनिया में सबसे सम्मानित सामाजिक अभियान का गौरव मिला है। और इसी के लिए मुझे बोस्टन यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई। 

अपनी नई फिल्म के बारे में हमें कुछ बताएं। आप इससे क्या हासिल करने की उम्मीद करती हैं?

अभी नई फिल्म सोनराइज़ (SONRISE) है। यह बेटों के उत्थान पर आधारित फिल्म है। इस फिल्म की शूटिंग हरियाणा में हुई है, जो राजधानी नई दिल्ली के नजदीक है। हरियाणा को भारत में पितृसत्तात्मक समाज का केंद्र भी माना जाता है। मेरी फिल्म एक अप्रत्याशित मुद्दे पर आधारित है।  मेरी फिल्म के लैंगिक नायक एक सामान्य पुरुष हैं, जो पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़ रहे हैं। भारत और खासकर हरियाणा के ये नायक मेरे लिए मानवता की जीत की मिसाल हैं। क्योंकि ये ऐसे इलाके से हैं, जहां अब बदलाव आ रहा है, उम्मीद की झलक दिख रही है।

सबसे महत्वपूर्ण संदेश जो हम इस फिल्म से दे रहे हैं, वह असल में मैं नहीं हूं। यह मेरे दोस्त के नायक हैं। ये ऐसी महिलाएं हैं, जो किसी सुरक्षा के साये में नहीं रहना चाहतीं। हमें किसी सहयोगी की तलाश थी। और ऐसा ही कुछ पुरुषों ने दिखाया है। फिल्म में हमारा मुख्य नायक दो बेटियों का पिता है। उसका नाम सुनील जागलान है। वह एक गांव का प्रधान है। वह अपनी बेटियों के लिए सिर्फ एक बेहतर दुनिया चाहता है। आज उसका काम हजारों गांवों में बोल रहा है। इसने पूरे भारत में बहुत सी लड़कियों और महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है।

मुझे यह बताते हुए बेहद गर्व हो रहा है कि हमारी फिल्म सोनराइज के नायक सनी जगलान को हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पेज पर जगह मिली है। यह दिखाता है कि हम में से हर कोई कितना अजेय हो सकता है। ये ऐसे भारतीय हैं जो दुनिया भर में पितृसत्ता को चुनौती दे रहे हैं। लोग मुझे सोनराइज के लिए बधाई देते हैं। मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि यह फिल्म उन सभी को समर्पित है जिन्हें सोनराइज में दिखाया गया है और जिन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ने की हिम्मत दिखाई है। 

लैंगिक भेदभाव पूरे विश्व की एक समस्या है। आप भारत में इसे किस तरह देखती हैं?

हमने देखा कि भले ही ये कहानियां भारत से हों या अमेरिका से, इनमें महिलाओं को हमेशा ही शर्मसार किया जाता है। दोनों देशों में इसके पीड़ितों की संख्या बहुत ज्यादा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पात्र अलग अलग हैं। लेकिन यह समस्या एक वैश्विक वास्तविकता है। लैंगिक हिंसा, लैंगिक पूर्वाग्रह एक वैश्विक वास्तविकता है। लेकिन मैंने देखा है कि निर्भया केस के बाद, जिसमें चलती बस में एक मेडिकल इंटर्न लड़की से बलात्कार के मामले ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं, लोगों ने इसके बारे में बात करना शुरू कर दिया है। यह बदलाव की दिशा में पहला कदम है।

कोई भी बदलाव रातोंरात नहीं होता। हमें बस उसका साथ देना होता है। और एक फिल्म निर्माता के रूप में, मैं एक कहानीकार के रूप में लोगों की राय बदलने का प्रयास कर रही हूं। मैं दर्शकों के सामने इस मुद्दे को संवेदनशीलता के  पेश कर रही हैं, उसे सनसनीखेज बनाना हमारा काम नहीं है। इस उद्देश्य के लिए मैं और मेरी टीम प्रतिबद्ध है। बलात्कार जैसे मामलों को सनसनीखेज बनाना बहुत आसान होता है, लेकिन आप आंदोलन खड़ा करने के लिए कुछ नहीं करते हैं। और यह कुछ ऐसा है, एक वृत्तचित्र फिल्म निर्माता के रूप में आपको इसके बारे में बहुत, बहुत जिम्मेदार होना चाहिए। डॉटर्स ऑफ मदर इंडिया प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद मैंने अपनी कंपनी लॉन्च की और इसे रिस्पॉन्सिबल फिल्म्स का नाम दिया ताकि यह लगातार याद दिलाए कि जब आप मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाते हैं तो एक बड़ी जिम्मेदारी आपके कंधों पर होती है।

भारत में लैंगिक चर्चाओं के विमर्श पर आपके क्या विचार हैं?

मैं एक फिल्मकार हूं। कॉर्पोरेट दुनिया से मेरा कोई लेना देना नहीं हूं। लेकिन मैंने जो देखा है, उसमें संवाद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। पुरुषों को इस बातचीत का हिस्सा बनाना जरूरी है। यह तभी हो सकता है जब हम लैंगिक समानता को लेकर एक साहसिक और एकजुट टीम बनाएं। मैंने अपनी फिल्मों में देखा है, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप किसी को भी अलग थलग न करें।

इसीलिए सोनराइज में भी हमारा ध्यान अपने नायकों पर ज्यादा था। पूरी दुनिया इसे देख रही है। और खास बात ये है कि इसे सलाम करने के लिए उठने वालों में पुरुष पहले होते हैं। यह एक तरह की जीत है, क्योंकि जब आप दूसरे लिंग को अलग थलग कर देते हैं तो इससे आंदोलन नहीं बनता। अगर हम यह बदलाव लाने में सक्षम हो जाएं, जहां पुरुष समझें कि यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं है, यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है तो हम लक्ष्य के करीब पहुंच सकते हैं। अगर पुरुष यह समझ लें कि वह उनकी हिफाजत करने के लिए नहीं बल्कि उनके सहयोगी हैं तो हम करीब आ जाएंगे।

किसी को मजबूर करके बदलाव नहीं लाया जा सकता। ऐसे में ये घरों पर बातचीत के जरिए और लड़कों को समझाकर ही हासिल किया जा सकता है कि पुरुष होने का असली मतलब क्या होता है। और जरूरी नहीं है कि वह अकेला हो। हम देखते हैं कि बहुत सी फिल्मों में बहुत सारी गलतफहमियां दिखाई जा रही हैं और ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। लेकिन मुझे लगता है कि क्यों न उन्हें दिखाया जाए कि एक असल आदमी होना होता क्या है? एक ऐसा आदमी जो महिला के साथ आत्मविश्वास के साथ खड़ा हो, उसकी सुरक्षा, साझेदारी और सहयोगी के रूप में नहीं। बस यही लोगों को दिखाने की जरूरत है।

हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस को लेकर आपके पैनल से क्या उम्मीदें हैं?

मुझे लगता है कि इतने सारे संवाद होने जा रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि हम दिल से चर्चा करेंगे, जो जो कभी-कभी बदलाव के लिए जरूरी होती है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि दिमाग को बदलने से पहले दिल को छूना ज्यादा जरूरी होता है। मुझे उम्मीद है कि कहानी कहने की ताकत के जरिए हम ऐसा कर सकते हैं।

 

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